शीलवान होना विद्वान होने से अधिक महत्व पूर्ण

भगवान बुध्द के ५ शील हैं
(१) हिंसा न करना
(२) चोरी न करना
(३) व्यभिचार न करना
(४) झूंठ न बोलना
(५) नशा पान न करना |

भगवान बुध्द शीलों के पालन पर बहुत जोर दिया करते थे|उनका कहना था कि मनुष्य धर्म ग्रन्थ पढ़कर चाहे जितना विद्वान क्यों न हो जाये,परन्तु वह यदि मेरे पांच शीलों का पालन नहीं करता है तो सब व्यर्थ है|एक घटना सुनाता हूं|


एक राजा का महामात्य(प्रधान मंत्री)ब्राह्मण था| उसे वेद,उपनिषद,स्म्रतियॉ आदि सभी ग्रन्थ याद थे वह बहुत विद्वान था साथ ही वह भगवान बुध्द के पॉचों शीलों का पालन करता था अर्थात वह बहुत शीलवान भी था| राजा उसकी बहुत इज्जत करता था| एक दिन प्रधान मंत्री के मन में विचार आया कि राजा मेरी इज्जत विद्वान होने की वजह से करता है या शीलवान होने की वजह से ,इस बात की परीक्छा की जानी चाहिये| प्रधान मंत्री नगर में निकल पड़ाऔर एक सुनार की दुकान पर पहुंचा वहां सोने के सिक्के बने रखे थे| सुनार ने प्रधान मंत्री को बड़ आदर से बैठाया| प्रधान मंत्री ने एक सिक्का उठाकर अपनी जेब में रख लिया,सुनार ने देख लिया उसे बहुत गुस्सा आया लेकिन वेचारा कुछ कह नहीं सका| अब प्रधान मंत्री ने जैसे ही दूसरा सिक्का उठाया,सुनार ने उसका हाथ पकड़ लिया और कहा कि आप प्रधान मंत्री होकर चोरी करते हैं|चलो आपको राजा के पास ले चलता हूं| सुनार प्रधान मंत्री को राज दरवार में ले गया, सुनार ने राजा से कहा कि महाराज! आपके प्रधान मंत्री चोरी करते हैं|राजा ने प्रधान मंत्री से ही पूंछा प्रधान मंत्री जी क्या आपने चोरी की है?

प्रधान मंत्री ने कहा हां महाराज|मैंने चोरी की है|

राजा ने कहा प्रधान मंत्री जी आप ही बतायें कि आपको क्या दण्ड दिया जाय?

प्रधान मंत्री ने कहा महाराज मैं इस बात की परीक्छा कर रहा था किआप मेरी इज्जत विद्वान होने की वजह से करते हैं या शीलवान होने की वजह से|महाराज! विद्वान तो मैं अभी भी हूं क्योंकि मुझे वेद,उपनिषद, स्म्रतियां आदि धर्म ग्रन्थ अभी भी याद हैं|हां!मैंने भगवान बुध्द के चोरी न करने के शील को तोड़ा है इसलिये आप मुझे दण्ड देना चाहते हैं|भगवान बुध्द ने ठीक ही कहा है कि विद्वान होने से अधिक महत्व पूर्ण है शीलवान होना|

महाराज मेरा इस्तीफा स्वीकार करें,मै भगवान बुध्द की शरण में जाता हूं|और वह ब्राह्मण भगवान बुध्द की शरण में चला गया|



द्वारा - प्रो० शैतान सिंह शाक्य

(रसायन विज्ञान में M.Sc, Ph.D, 1974 से स्नातकोत्तर महाविद्यालय में रसायन विज्ञान के प्रोफेसर, विभागाध्यक्ष, उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग (उ० प्र०) द्वारा चयनित स्नातकोत्तर महाविद्यालय का प्राचार्य एवं कानपुर विश्वविद्यालय की सर्वोच्च समिति 'अधिशासी परिषद' के सदस्य के रूप में कार्य करते हुए सेवानिवृत्त)