बौध्द धर्म में दान का महत्व



भगवान बुध्द द्वारा बतायी गयी १० पारमिताओं में दान पारमिता का विशेष महत्व है|दान पारमिता हमें स्वार्थ के भाव से मुक्त करती है|


संयुक्त निकाय में दान और युध्द को समान माना गया है|जिस प्रकार युध्द में शत्रु पर विजय प्राप्त करने के लिये साहस के साथ वीरता पूर्वक युध्द करना पड़ता है,उसी प्रकार छोटे से छोटे दान के लिये अपने अन्दर के लोभ रूपी शत्रु पर विजय प्राप्त करनी होती है|


दान करने के लिये व्यक्ति का धनवान होना आवश्यक नहीं है|एक गरीब व्यक्ति भी दान पारमिता का पालन करते हुये अग्यानता के किनारे से ग्यानता के किनारे तक पहुंच सकता है|


गरीब व्यक्ति के लिये भगवान ने ७ प्रकार के दान बताये हैं|


(१) शारीरिक दान :-


गरीब व्यक्ति मेहनत के काम में अपनी सेवा दे सकता है|अपने शरीर का भी दान कर सकता है|भगवान ने अपने पूर्व जन्म में अपनी आंख दान की थी|एक बोधि सत्व द्वारा अपना शरीर दान करने की कथा भी बौध्द साहित्य में पढ़ने को मिलती है|


(२) अध्यात्मिक दान :-


इसमें हमें दूसरों के दुखों को बांटना चाहिये, किन्तु उस समय हमारा मन करुणा से ओत-प्रोत रहना आवश्यक है|


(३) नेत्र दान :-


भगवान ने तीसरा दान नेत्र दान बताया है|इसका तात्पर्य है कि हमारी नजर इतनी सौम्य तथा शालीन होनी चाहिये कि देखने बाले का मन शान्त हो जाय, समता में आ जाये|


(४) मुस्कान दान :-


इस प्रकार के दान में हम अपने चेहरे से ऐसी मुस्कान बिखेरें कि जो दूसरों के दुखों को दूर करदे,तथा उसके मन को शान्त कर दे|


(५) वाणी दान :-


हमारी वाणी तथ्यों पर आधारित हो|हमारी वाणी मधुर हो, हम वे ही शब्द बोलें जिससे दूसरों का भला हो,कटुता बढ़े|हम चुगली न करें|


(६) आसन दान :-


इस दान से तात्पर्य है कि हम जहां बैठें हों,वहां यदि कोई हम से अधिक योग्य व्यक्ति जाय तो हम आसन से उठ कर आदर करें और उसे उचित आसन दें|


(७) स्थान दान :-


इसका तात्पर्य यह है कि हमारे पास जो स्थान है उसे हम धार्मिक कार्य करने के लिये उपलव्ध करायें,अन्य कल्याणकारी कार्य करने के लिय दूसरों को दें|अतिथियों के लिये रात्रि में ठहरने की व्यवस्था करें|




द्वारा - प्रो० शैतान सिंह शाक्य

(रसायन विज्ञान में M.Sc, Ph.D, 1974 से स्नातकोत्तर महाविद्यालय में रसायन विज्ञान के प्रोफेसर, विभागाध्यक्ष, उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग (उ० प्र०) द्वारा चयनित स्नातकोत्तर महाविद्यालय का प्राचार्य एवं कानपुर विश्वविद्यालय की सर्वोच्च समिति 'अधिशासी परिषद' के सदस्य के रूप में कार्य करते हुए सेवानिवृत्त)